Valentine day

फिर से बहारों का मोसम गया है। फ़रवरी का महीना आते ही, हर तरफ़ ऐसा लगता है मानो इस महीने प्यार का इजहार ना किया तो मानो फिर कभी मोक़ा ही नहीं मिलेगा। बाज़ार अटे पड़े है तोहफ़ों से , दिल के ग़ुब्बारे , चाकलेट  , टेडी बीयर , फूल और जाने क्या क्या।

इस वेलंटाइन डे पर कुछ फ़ैक्ट्स भी जाने जाए। सबसे पहली बात तो यही है की प्यार का एहसास दिल मैं नहीं दिमाग़ को ही होता है , बिचारे दिल को काम से एक पल भी फ़ुरसत नहीं मिलती की वो इश्क़ ,मोहब्बत जैसी  बातों के बारे मैं सोचे भी, अगर सोचने लगेगा तो इश्क़ करने वाले का ही काम तमाम हो जाएगा। किसी को देख कर दिल तेज़ धड़कने लगता है या ऐसा लगता है मानो दिल ने धड़कना ही बंद कर दिया हो , पर असल मैं  ऐसा कुछ होता नहीं है,यह सब हार्मोंस का खेल है।

जब भी कोई किसी से कहता है कि, मैं तुम्हें दिल से प्यार करता हू , असल मैं वो दिल से नहीं दिमाग़ से प्यार करता है , बिचारे दिल को हर जगह ख़ून पहुँचाने से फ़ुरसत मिले तब तो प्यार , मुहब्बत मैं पढ़े।

किसी के भी प्रति आकर्षण , प्यार या लगाव के लिए दो हार्मोन , टेस्टास्टेरोन और ऐस्ट्रोजेन ही ज़िम्मेदार है। जब भी कभी शारीरिक आकर्षण के बाद सचमुच का लगाव या प्रेम का अनुभव होता है , जिसे सच्चा प्यार कहते है ,उसके लिए शरीर मैं बनने वाले मोनोएमीन्स ज़िम्मेदार होते है। ये मोनोएमीन्स तीन प्रकार के होते है , डोपामाइन , नोरपाइनफ़ाइन और सेरोटोनीन।

जब भी मस्तिष्क की ग्रंथिया डोपामाइन का स्त्राव करती है तब हमें फेंटेसी का अनुभव होता है ( जैसे हवायें चलने लगती है , फूल खिलने लगते है , जब कभी भी अपने प्रिय पात्र को देखते है तो ), जब मस्तिष्क नोरपाइनफ़ाइन का स्त्राव करता है तो प्रेमी पात्र को देख कर दिल ज़ोरों से धड़कने लगता है, पसीना आने लगता है , क्या बोलू क्या बोलू कुछ समझ मैं नहीं आता है , जब कभी सेरोटोनीन का लेवल बढ़ जाता है तब उन्माद छा जाता है जैसे कीमैं तेरे प्यार मैं पागलजैसी परिस्थिति जाती है।

जब दो लोग मिलते रहते है , और दोनो मैं एक आपसी समझ और कमिटमेंट जाती है तब भी दो हार्मोन सक्रिय होते है , ऑक्सीटोसिन और वेसोप्रोसिन। जब भी ब्रेकअप हो तो समझ जाइए , ज़रूर इन हार्मोंस ने कुछ गड़बड़ की है।इन्ही हार्मोंस के असंतुलन के कारण ब्रेक अप के बाद डिप्रेशन होता है 

तो आया समझ मैं की असल मैं प्यार आता कहाँ से , दिल से नहीं दिमाग़ से, अब तीर से दिल का निशाना लगाने के बजाय दिमाग़ पर लगाइए

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usha jain bhatnagar

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