कालसर्प योग

कालसर्प योग के बारे मैं जनमानस मैं डर व कई भ्रांतिया है , मैं अपने इस ब्लॉग मैं कालसर्प योग के बारे मैं सरल व तथ्यपरक जानकारी दे रही हू जिससे सामान्य व्यक्ति जिसे ज्योतिष के बारे मैं बहुत जानकारी ना हो वह भी जान सकता है की उसकी कुंडली मैं किस प्रकार का कालसर्प योग है ।
जन्म पत्रिका मैं जब सभी ग्रह राहु एवं केतु के मध्य हो जाते है तो काल सर्प योग बनता है । राहु एवं केतु हमेशा वक्रि भ्रमण करते है , अर्थात जिस राशि मैं स्थित होते है वहाँ से गोचर मैं भ्रमण के दोरान पिछली राशि मैं जाएँगे ।
पूर्ण कालसर्प योग मैं सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य स्थित हो जाते है । यदि चंद्रमा राहु और केतु की परिधि से बाहर निकलता है तो अर्ध कालसर्प योग का निर्माण होता है  यदि दो या दो से अधिक ग्रह राहु केतु की परिधि से बाहर हो तो कालसर्प योग नहीं बनता है , यह भी जातक पर दुष्प्रभाव डालता है ।
राहु को कालसर्प का मुख और केतु को कालसर्प की पूँछ माना जाता है

जन्म पत्रिका मैं राहु जिस भाव मैं स्थित हो उसी के अनुसार भिन्न भिन्न प्रकार के कालसर्प योग का निर्माण होता है ।
कालसर्प योग 12 प्रकार के होते है ।

कारकोटिक कालसर्प योग

यदि लग्न मैं राहु एवं सप्तम भाव मैं केतु स्थित हो एवं सभी ग्रह सप्तम भाव से ले कर लग्न तक स्थित हो तो कारकोटिक कालसर्प योग बनता है ।
लग्न मैं ही राहु के स्थित होने से इस योग का प्रभाव जातक के व्यक्तित्व , स्वास्थ , कार्य , स्वभाव , लगभग जीवन के हर क्षेत्र मैं पड़ता है ।
इस योग का दुष्प्रभाव 18 वर्ष की आयु के पस्चात ही दिखाई देता है ।
लग्न और सप्तम भाव के मध्य होने से वेवाहिक जीवन मध्यम रहता है , जातक क्रोधी , घमंडी व बोलने मैं ध्यान नहीं रखने  वाला होता है जिससे जीवनसाथी से अन बन चलती रहती है ।
यदि इस योग मैं राहु के साथ लग्न मैं सप्तमेश की युती हो तो जातक का दाम्पत्य जीवन बेहद तनावपूर्ण व दुखी रहता है
इस योग के कारण जातक अपने स्वभाव व कार्य के कारण कार्य क्षेत्र , परिवार व समाज मैं रूकावटें खड़ी कर लेता है।
जंहा तक हो सके किसी भी प्रकार के अनेतिक व गेर क़ानूनी कार्यों से बच कर रहे ।

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शंखनाद कालसर्प योग

यदि दिृतीय भाव मैं राहु तथा अष्टम भाव मैं केतु स्थित हो तो तथा अन्य सभी ग्रह इनके मध्य स्थित हो तो शंखनाद कालसर्प योग बनता है ।
इस योग का प्रभाव जब राहु की महदशा हो या अंतर्दशा हो तब अधिक दिखाई देता है ।
दिृतीय भाव मैं होने से परिवार व धन व वाणी पर प्रभाव दिखाई देता है । पेत्रक संपती पर भी इसका प्रभाव रहता है ।
इसके दुष्प्रभाव से संचित धन का नाश होता है , कूटुंबिजनो से विवाद एवं आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है
ऐसे जातक सामान्यत परिवार से अलग रहते है ।
यदि सप्तमेश राहु के साथ दिृतीय भाव मैं स्थित हो तो ससुराल पक्ष से समस्या रहती है व सम्बंध सामान्य नहीं रहते है , बातचीत मैं संयम ना रहने से कार्य क्षेत्र व परिवार मैं परेशानिया आती है ।
                 
                         
             
       
                           

अन्य काल सर्प योगों के बारे मैं मेरे अगले ब्लॉग मैं पढ़े ।








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