कालसर्प योग 2

पातक कालसर्प योग 

यदि तृतीय भाव मैं राहु तथा नवम भाव मैं केतु स्थित हो एवं अन्य सभी ग्रह इन दोनो के मध्य स्थित हो तो पातक नामक कालसर्प योग बनता है ।
युवावस्था मैं जब भी राहु की दशा या अंतर्दशा आती है तब इसका अशुभ प्रभाव मिलना शुरू हो जाता है । 
तृतीय भाव मैं होने से भाईयों पर व उनसे संबंधो पर इसका प्रभाव पड़ता है । 
इस योग के जातक धेर्यहीन व लापरवाह क़िस्म के होते है । कार्यों मैं अनसोचि रूकावटें आती रहती है , यात्रा मैं क़स्ट व हानि होती है ।
दाम्पत्य जीवन छोटे भाई बहनो के कारण तनावपूर्ण रहता है , अनेतिक सम्बंध भी तनाव का कारण होते है । 
स्वयं के दुस्साहस के कारण हानि होती है ।
क्रय विक्रय के कार्यों मैं असफलता मिलती है , यात्राओं से सम्बंधित कार्यों मैं भी असफलता मिलती है ।
             
                                 
 


विषाक्त कालसर्प योग 

यदि राहु चतुर्थ भाव मैं व केतु दशम भाव मैं स्थित हो व अन्य सभी ग्रह इनके मध्य स्थित हो तो विषाक्त नामक कालसर्प योग बनता है । 
पारिवारिक जीवन प्रभावित होता है । इस योग का प्रभाव चार वर्ष की आयु से दिखने लगता है व कई कुंडलीयो मैं विवाह के पस्चात अधिक प्रभाव दिखाई देता है । 
इस योग का प्रभाव जातक की माता , मान सम्मान , पारिवारिक जीवन , भवन व वाहन पर दिखाई देता है । 
माता के सुख मैं कमी रहती है , जातक स्थायी रूप से कही रह नहीं पता है , संपती , घर व वाहन सुख मैं भी बाधा आती है यदि चतुर्थ भाव मैं राहु के साथ सप्तमेश की युती हो तो जीवनसाथी के परिवार के सदस्यों से तनाव व विवाद के कारण मानसिक शांति भंग हो जाती है । 
विवाह के बाद परिवार से दूर रहना पड़ता है । 
भूमि , संपती व वाहन से जुड़े कार्यों मैं हानि होती है । 
               

शेषनाग कालसर्प योग 

जब पंचम भाव मैं राहु एवं एकादश भाव मैं केतु स्थित हो और अन्य सभी ग्रह इनके मध्य स्थित हो तो शेष नाग नामक कालसर्प योग बनता है । 
इस योग का प्रभाव विद्धया , संतान एवं अध्यन पर पड़ता है । 
इस योग की वजह से प्रेम प्रसंगो मैं असफलता मिलती है जिससे निराशा का सामना करना पड़ता है ।
अगर पंचम भाव मैं राहु के साथ सप्तमेश की युती हो तो जातक प्रेम प्रसंगो के कारण दाम्पत्य जीवन बरबाद कर लेता है 
पंचमेश राहु के कारण अधिक महत्वकांशी होता है व जोखिम पूर्ण कार्य करता है , अनेतिक संबंधो के कारण भी कई पारेशानियो का सामना करना पड़ता है । 
                 
                 



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